* इस्तांबुल - दो महाद्विपों पर बसा महानगर

क्या आप कुडादान खोज रहे हैं ? यह प्रश्न मुझसे एक सुटेड - बुटेड बुजुर्ग नें किया. मेरे हां कहने पर उन्होनें मुझसे कहा, "लाइये आप यह डंठल मुझे दे दें, कुडादान वहां सामने गली में रखा हैं. मैं उसी ओर जा रहा हुं, अतः
मै खुद इसे डाल दुंगा". यह सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ. दरअसल मैं इस्तन्बुल के महशुर पर्यटक स्थल हिप्पोड्राम के विशाल मैदान के बाहर खडा एक कुडादान खोज रहा था, क्योंकि मेरे हाथ में एक नमकीन गर्म पानी में सिका हुआ भुट्टा खाने के बाद बचा हुआ डंठल था. 

फिर मुझे सडक के उस पार ड्रम की साईज की तीन कोकाकोला की बोतलें दिखीं. मुझे गलतफहमी हुई कि शायद कोकाकोला कम्पनी नें ही इन बोतलनुमा डस्टबीन को सडक पर रखा है. चुंकी विदेशों मे सार्वजनीक स्थलों पर तीन या चार कुडादान एक साथ रखे होते हैं. ताकी उनमें शीशा, धातु, कागज, प्लास्टीक इत्यादी को अलग - अलग डब्बों में डाला जा सके. इससे उनकी रिसायकिलिंग करने में आसानी हो जाती है. अतः मैं सडक पारकर उन बडी बोतलों का ढक्कन खोलने की कोशिश करने लगा. पर मैं समझ नहीं पा रहा था कि उन्हें कैसे खोलुं क्योंकि वे पुरी तरह से पेक थी. 

तभी सामने की दुकान पर खडे एक बुजुर्ग सज्जन जो मुझे देख रहे थे, समझ गये कि मैं कुडादान खोज रहा हुं.  वे मेरे पास आकर बोले कि, यह तो सिर्फ कोकाकोला कम्पनी का विज्ञापन है. फिर हाथ से इशारा कर बताया
कि सामने वाली उस गली में एक कुडादान रखा हुआ है. मैनें उन्हे धन्यवाद देकर कहा कि ठीक है, मैं वहां उसे खोज लुंगा. पर तब तक उन्होनें अपना हाथ बढाकर मुझसे मेरा जुठा डंढल छीन लिया व स्वयं फेंकने के लिये चले गये. 

मैं हतप्रभ खडा उन्हे जाते देख रहा था. वे बुजुर्ग कपडों व बातचीत से पढे लिखे व सभ्य लग रहे थे. अतः मुझे बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि वे इतनी विनम्रता दिखलायेंगे. मैं कल्पना करने लगा कि अगर मैं उनकी जगह होता तो क्या इतनी हिम्मत कर पाता, नहीं शायद बिलकुल भी नहीं. बल्कि मैं तो यहां तक समझता हुं कि हिन्दुस्तान में कोई सफाई कर्मचारी भी आगे बढकर इतनी मदद नहीं करता.

मैं स्वीकार करता हुं कि अगर मैं हिन्दुस्तान में होता, तो शायद इतनी जहमत ना उठाते हुए, मैं उस डंठल को कहीं भी फेंक चुका होता. पर एक तो विदेश व दुसरा इतना खुबसुरत शहर, जहां कचरा ढुढे तो नहीं दिखे, तो मेरा मन नहीं हुआ कि मैं अपनी ओर से गंदगी फैलाउं. हालांकी हम हिन्दुस्तानी इस मामले में सारी दुनिया में बदनाम हैं.  

जिस प्रकार चावल के एक दाने को देखकर यह तय किया जाता है कि सारे चावल पक चुके होंगे या नहीं. इसी प्रकार किसी भी एक व्यक्ती के व्यवहार को देखकर उसके देश के चरीत्र का लगभग अंदाजा लगाया जा सकता है. हालांकी अपवाद सभी जगह होते हैं, पर उन सज्जन को देखकर मैनें तुर्की के लोगों के बारे में जो राय बनाई, उसका अनुमान लगाना आपके लिये बहुत आसान है.   

तुर्की का अधिकारीक नाम "रिपब्लीक आफ टर्की" है. यह ऐतिहासिक देश युरोप व एशिया दोनों में फैला हुआ है हालांकी यहां से अफ्रीका भी काफी नजदीक है.  इसका अधिकांश भाग एशिया महाद्विप में ही है, तथा इसका
मात्र 3% हिस्सा ही युरोप में है. तुर्की के एशिया वाले भाग को अनातोलिया या एशिया माईनर भी कहा जाता है.  इसका क्षेत्रफल लगभग 7.83 वर्ग लाख किलो मीटर है, व आबादी लगभग 7.60 करोड है. इसकी सीमाएं आठ देशों से लगी हैं, जिसमें युरोप में बुल्गारिया, ग्रीस, जार्जिया हैं, व दुसरी ओर एशिया में आर्मेनिया, ईरान, अजरबैजान, इराक, सीरीया हैं. इसके अलावा मेडीटेरियन सागर, एजीयन सागर, काला सागर व सी आफ मारमरा सहीत कुल चार सागर भी इसकी सीमाओं को छुते हैं. 

दुनिया में तुर्की के अलावा कई अन्य देश है, जो दो महाद्विपों पर फैले हुए हैं. इन्हें ट्रांसकांटिनेंटल कंट्री कहते हैं. जैसे कि मिस्र जो अफ्रिका व एशिया में फैला हुआ है. इसी प्रकार पुराने सोवियत संघ के टुटने से बने रुस, अजरबैजान, जार्जिया व कजाखस्तान देश युरोप व एशिया दोनों महाद्वीपों में बसे हुए है. द्वितीय विश्व युद्ध के पहले ग्रेट ब्रिटेन एक मात्र ऐसा देश था जिसका सिक्का युरोप, एशिया, अफ्रिका, आस्ट्रेलिया व उत्तरी अमेरीका सहित पांच महाद्विपों पर बसे 54 देशों पर चलता था, किन्तु विश्व युद्ध के बाद हुए राजनैतिक बदलाव के कारण वह अब सिमटकर सिर्फ युरोप तक ही रह गया है. यहां तक की उसे हांगकांग भी 1997 में चीन को सौंपना पडा.

रुस, अजरबैजान, जार्जिया, कजाखस्तान व मिस्र में कई छोटे - मोटे शहर हैं जो दो महाद्वीपों पर बसे है, लेकिन सारी दुनिया सिर्फ इन्तन्बुल को ही ट्रांसकांटिनेंटल सीटी के नाम से जानती है, जो युरोप व एशिया दो  महाद्विपों पर बसी हुई है.  इस महानगर में भरपुर प्राकृत्रिक सौन्दर्य के अलावा इतिहास भी चप्पे चप्पे पर बिखरा पडा है.  दुनिया के अन्य महानगरों की तरह ही यहां आधुनिक गगनचुम्बी अट्टालिकाएं भी बनी हुई है,
जो इस ऐतिहासिक महानगर को एक आधुनिक परिवेश भी प्रदान करती हैं. यह तुर्की देश की व्यापारिक राजधानी है, जबकी यहां कि राजनैतिक राजधानी अंकारा है जो एशिया में है. 

मैने दुनिया के कई बडे शहर देखे है, इसलिये मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस्तन्बुल निश्चित रुप से दुनिया के दस सबसे खुबसुरत शहरों मे से एक है. आखिर क्यों ना हो, यह विश्व की चार महान प्राचीन सभ्यताओं रोमन, लेटीन, बाइजेंटाइन और ओटोमान का अनोखा संगम है. आप स्वयं अंदाजा लगाये कि सात छोटी छोटी पहाडीयों पर बसा हुआ यह शहर कितना खुबसुरत लगता होगा, जिसके उत्तरी किनारे पर काला सागर, दक्षिणी छोर पर मारमारा सागर व बीच में इन दोनों सागरों को जोडने वाली 31 किमी लम्बी पानी की नहर जिसे बास्फोरस स्ट्रेट (जलडमरु मध्यमार्ग) जो इस महानगर को अपने बायीं ओर युरोप व दाईं तरफ एशिया में विभक्त करती है. यह जलमार्ग कम से कम 700 मीटर चौडा व अधिकतम 3400 मीटर चौडा है, व इसकी औसत गहराई 65 मीटर है.  यहां के पानी में जेली फीश की बहुतायत है, जो आसानी से देखी जा सकती है. 

युरोप की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाने वाले इस इस्तन्बुल महानगर की खुबसुरती बढाने के लिये बास्फोरस स्ट्रेट के दक्षिणी छोर पर जहां से मारमारा सागर शुरु होता है, वहीं युरोप वाले भुभाग में स्थित है गोल्डन हार्न
नामक एक प्राकृत्रीक बंदरगाह. यह लगभग 7.5 किलोमीटर लम्बा 750 मीटर चौडा है. इसकी अधिकतम गहराई 35 मीटर है, जो सैलानियों को एक विशाल नदी का आभास देता है. इसी दोनों किनारों पर बसे राजमहल, मस्जिदे, बाजार व खुबसुरत भवन इस्तन्बुल की शान में चार चान्द लगाते हैं. या यह भी कह सकते हैं कि, यह गोल्डन हार्न ही पिछले ढाई हजार वर्षों से इस्तन्बुल की प्रत्येक गतिविधीयों का केन्द्र है.  सिल्क रुट से जुडाव होने के कारण इतिहास में इसका एक अलग ही महत्व रहा है.

गोल्डन हार्न के दोनों छोरों को जोडने के लिये चार पुल बने हैं जो इस नगर की शान बढाते हैं. इनमें से सबसे पहले पुल को छठी शताब्दी में महान सम्राट जस्टीनियन नें बनाया था. इन चारों पुलों के नाम हैं, गलाता ब्रिज, ओल्ड गलाता ब्रिज, हेलीक ब्रिज, अतातुर्क ब्रिज. हालांकी इनके तुर्की भाषा में अलग नाम हैं, जिससे गलतफहमी हो सकती है. अभी मेट्रो ट्रेन के आवागमन के लिये एक नया पांचवा ब्रिज बन रहा है. इसी प्रकार सोलहवीं शताब्दी में विश्व प्रसिद्ध मोनालीसा पेटींग को बनाने वाले चित्रकार लियोनार्दो दा विन्ची जो आर्किटेक्ट भी थे, नें तत्कालिन सुल्तान को गोल्डन हार्न पर एक खुबसुरत पुल बनाने के लिये नक्षा भी बना कर दिया था, किन्तु किसी कारणवश वह पुल नहीं बन पाया.  

आप अगर घर बैठे इस एक करोड चालीस लाख की आबादी वाले इस्तन्बुल शहर की भौगोलिक स्थिती देखना
चाहते हैं, तो गुगल अर्थ का सहारा लिजीये.  इसमें आपको युरोप, एशिया, ब्लेक सी, सी आफ मारमारा, बास्फोरस व गोल्डन हार्न बिलकुल आसानी से दिख जायेंगे. 

कई स्थानीय निवासी जिनके घर गोल्डन हार्न ब बासफोरस स्ट्रेट के आसपास हैं, वे आने जाने के लिये यहां चलने वाली फेरी का उपयोग करते हैं. वहीं दुसरी ओर पर्यटकों को गोल्डन हार्न से इस्तन्बुल का मनोहारी दृष्य दिखलाने के लिये के लिये कई स्टीमर चलते हैं. इनमें से कई पर रेस्टोरेंट भी हैं. शाम के समय इन स्टीमर पर खाना खाते हुए इस्तन्बुल की छटा को देखना एक अद्भुत अनुभव है. इन पर रात्री में अरब जगत का महशुर बेली डांस भी होता है. इस डीनर की किमत लगभग 50  युरो होती है, जिसमे आपकी होटल से क्रुज तक लाना व वापिस छोडना भी शामिल है. शायद आपको बालीवुड के कुछ महशुर बेली डांस याद होंगे. जिसमें प्रमुख हैं, फिल्म गुरु का मल्लिका शेरावत का "मैया मैया".  या फिर शोले में हेलन का "महबुबा महबुबा". या फिर द ग्रेट गेम्बलर मे जीनत अमान का "रक्कासा मेरा नाम". 

इसी प्रकार तुर्की का एक और "सुफी - दरवेश डांस" भी विश्व प्रसिद्ध है, जिसमे सुफी संत गोल - गोल घुमकर
डांस करते हैं. इस के भी इस्तन्बुल मे प्रतीदिन कई जगह शो होते हैं, जिसका टिकट 10 युरो तक है. शायद आपको बहुचर्चित फिल्म जोधा - अकबर का गाना - "ख्वाजा मेरे ख्वाजा, मेरे दिल मे समा जा" याद होगा. वह भी तुर्की का प्रसीद्ध सुफी - दरवेश डांस ही था. पहले तो दरवेश स्वयं यह नृत्य करते थे, किन्तु आजकल स्टेज कलाकार यह काम करते हैं. 

तुर्क शब्द सुनते ही निश्चीत रुप से आपकी कल्पना में एक साहसी योद्धा की छवी उभर कर आई होगी. ठीक उसी प्रकार मेरे भी मस्तिष्क में तुर्कीयों के लिये एक जुझारु लोगों की छवी बनी हुई थी, क्योंकि पिछले हजारो वर्षों से तुर्क सेनाओं नें एशिया, अफ्रिका व युरोप के कई देशों में बर्बर युद्द कर अपनी कामयाबी के झंडे गाडे थे. हिन्दुस्तान में "युवा तुर्क" शब्द गर्म खुन वाले नौजवानों के लिये एक मुहावरे के रुप में उपयोग में लाया जाता है. जैसे कि हमारे पुर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी को एक समय युवा तुर्क कहा जाता था. 

मेरी इस सोच को बल मिला काहिरा से इस्तन्बुल आने वाले विमान में. जब मैनें एक तुर्की भाषा का महशुर समाचार पत्र हुर्रियत उठाया, तो उसके प्रथम पृष्ट पर एक तस्वीर छपी थी, जिसमें हाथ में पिस्तोल लिये एक युवा बहुत गुस्से में खडा था व कई लोग उसे थामने की कोशिश कर रहे थे, व उनके सामने पुलिस भी खडी दिख रही थी. तुर्की भाषा की लिखावट रोमन लिपी से मिलती जुलती ही होती है, पर मैं कुछ समझ नहीं पाया कि
उसमें क्या लिखा था. किन्तु मेरे दिमाग में एक अदृष्य भय बैठ गया कि तुर्की लोग लडाकु होते हैं, अतः मुझे अपने तुर्की प्रवास के दौरान सावधानी से रहना चाहिये. किन्तु फिर बाद में मेरे साथ हिप्पोड्राम पर जो घटना हुई उससे मेरे दिमाग में जो तुर्कियों के लिये जो गलतफहमी थी वह दुर हो गयी. अंततः मैनें यही पाया कि तुर्की लोग मिलनसार व खुशमिजाज होते हैं.   

तुर्की एक मुस्लिम राष्ट्र है, लेकिन यहां के मुसलमान बहुत उदारवादी और खुले विचारों वाले होते हैं.  यहां आबादी की 98%  जनता इस्लाम धर्म को मानने वाली हैं.  पर समाज में खुलापन है.  उनके स्त्री - पुरुष अन्य युरोपियन लोगों जैसे ही गोरे चिठ्ठे होते हैं. बडे शहरों में महिलाये पश्चिमी परिधान पहनती हैं, जबकी छोटे शहरों व गावों मे महिलाएं सिर पर स्कार्फ लगाकर रहती हैं व पुरे शरीर को ढंक कर रखती है. 

हिन्दुस्तानियों व तुर्कीयों में कोई तो रिश्ता है. क्योंकि हमारे कई शब्द वे बोलते हैं, या फिर यह भी हो सकता है कि हम उनके शब्दों को उपयोग में ला रहे हों. पिछले हजारों वर्षों के सांस्कृतिक, व्यापारिक, व सैन्य आदान
प्रदान के कारण शायद यह हुआ है. आईये गौर फरमाईये तुर्की भाषा के कुछ शब्दों पर जिन्हें हम पहचानते हैं, जैसे - बाजार, दुकान, फकीर, फर्क, फायदा, हाल (हाल-चाल वाला), हवा, पानी, साबुन, हयात, हाजिर, ऐलान, इन्सान, कबुल, कस्बा, दिक्कत, जम्हुरियत, हफ्ता, कारा (काला), माल, मंजर, मेहरबा (हेल्लो), महशुर, मेवे, मिनार, निहायत, राहत, सुबह, सलाम, सिफर, सोहबत, शक्कर, मस्जिद, चाय, शिकायत, शहर, सराय, तरफ, तारिफ, वतन, जहमत, आईना, बाबा, बहार. यह तो सिर्फ एक बानगी है,  तुर्की भाषा में ऐसे शब्दों की भरमार है जिन्हें हम हिन्दुस्तानी भी बोलते हैं. 

सुबह के करीब पांच बजे हमारा टर्कीश एयर लाईन्स का विमान काहिरा से इस्तन्बुल के सबसे बडे अतातुर्क इन्टरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरा. बाहर निकलने में करीब आधा घंटा लग गया, कारण मुझे कस्टम वालों ने रोक लिया था. बाहर निकलते समय स्केनर से बेग चेक करते समय उन्हे मेरे बेग में मिस्र से लाये हुए सामान दिख गये. इस कारण बेग खुलवाकर देखा व फिर तसल्ली करने के बाद ही बाहर जाने दिया. 

मुझे यह तो पता था कि सुल्तान अहमेत नामक इलाका जिसमें तमाम ऐतिहासिक महत्व के भवन स्थित हैं, ही पर्यटको के ठहरने की पसंदीदा जगह है.  मैनें इस्तन्बुल आने से पहले कोई होटल बुक नहीं करवाई थी. सोचा था कि वहीं जाकर खोज लुंगा. एयरपोर्ट से बाहर निकलने के बाद मेनें एक टेक्सी वाले से पुछा कि क्या आप मुझे सुल्तान अहमत में कोई इकानामी होटल बतला सकते हैं. उसनें कहा, आइये खोजते है. फिर हमें करीब बीस
किलोमीटर की दुरी को तय करने में तकरीबन बीस मिनट लगे. सुबह रास्ता सुनसान था. वैसे भी वहां गर्मियों मे देर रात लगभग 9 बजे तक सुर्य रहता है, व सुबह भी काफी जल्दी पांच बजे ही उजाला हो जाता है. 

सुबह के छह बज चुके थे, पर फिर भी ऐसा लग रहा था कि इस्तन्बुल सो रहा हो. एयरपोर्ट नये इलाके में बसा हुआ है. रास्ते में सैकडों गगनचुम्बी इमारते हैं. फिर उसके बाद हम सुल्तान अहमेत में पहुचे तो ऐसा लगा जैसे पुरानी दिल्ली या लखनऊ में पहुच गये हों. छोटी - छोटी पहाडियों पर संकरी मगर साफ सुथरी गलियां. ऐसा लग रहा था कि मैं मध्य युग में पहुंच चुका हुं. हर मकान के आगे गमलों में रंग बिरंगे खिले हुए फुल व पौधे. ऐसा लग रहा था मानो वे आपका मुस्कराकर स्वागत कर रहे हों.

फिर एक होटल के बाहर लाकर उसनें रोका व मुझसे कहा कि आप अंदर पुछकर आयें कि जगह है या नहीं. मेरे बहुत घंटी बजाने के बाद भी किसी नें दरवाजा नहीं खोला. फिर हम कुछ दुरी पर एक और होटल में गये, वहां एक आदमी उनिंदा सा आया और मना कर दिया कि रुम खाली नहीं है. उसनें मुझसे कहा कि गर्मियों के कारण सैलानियों की भरमार है. अतः आपको थोडी सी मुश्किल आयेगी. पर चिंता की कोई बात नहीं. आप अगली गली में एक छोटी सी होटल है वहां तलाश कर लें.

समुचा सुल्तान अहमेत इलाका सस्ते - महंगे तमाम प्रकार के सेकडों होटलों से भरा पडा हैं, अतः ठहरने को लेकर कोई समस्या तो नहीं आना थी. पर चुंकी अभी उजाला होना शुरु ही हुआ था एवं बाजार में आवाजाही शुरु होने में अभी देर थी. पर्यटक स्थलों पर गर्मियों में देर रात तक चहल पहल होती है, तो फिर जनता सुबह देरी तक सोकर उठती है. इसलिये होटलों के दरवाजे अभी तक नहीं खुले थे. 

फिर हताश होकर हम नजदीक गली में बताये गये होटल तक पहुंचे. वह बाहर से मुझे एक साधारण मकान जैसा ही दिखा, पर वहां एक बोर्ड लगा था तो कोई संशय नहीं हुआ. घंटी बजाने पर एक महिला नें दरवाजा खोला व तुर्की भाषा में कुछ कहा और अंदर चली गयी. मैनें टेक्सी ड्रायवर की ओर देखा तो उसनें कहा की इन्तजार करो. फिर एक पुरुष आया व मुस्कुराते हुए बोला आईये आपका स्वागत है. 

अब मैं समझ चुका था कि इसके पास रुम खाली है, तो मैनें सबसे पहला काम टेक्सी वाले का बिल 38 युरो चुकाया व उसे रवाना किया ताकी उसके मीटर के वेटींग चार्ज में और बढोतरी ना हो. फिर मैं बेग लेकर अंदर
गया. पहले पहल मुझे आभास हुआ कि मैं होटल में नहीं वरन किसी के घर में आ गया हुं. फिर मैं अपने रुम तक पहुंचा जो छोटा मगर साफ सुथरा था. उसमें अटेच्ड टायलेट, रुम हीटर (सर्दियों के लिये) इत्यादी सभी सुविधा थी. मुझे उसका किराया 25 युरो प्रतीदिन बताया व साथ में सुबह का नाश्ता भी. 

मैं रात भर के जागरण के कारण बेहद थका था, तो मोबाईल में एक बजे का आलार्म लगाकर सो गया. फिर दोपहर में जब तैयार होकर नीचे आया तो होटल मालिक ओक्टाय बालकिर मुझे रिसेप्शन पर मिले. उन्होनें मुझसे कहा कि आपनें बेवजह में टेक्सी का महंगा भाडा दिया. यहां एयरपोर्ट पर ही शेयर्ड वेन मिलती हैं जो सुल्तान एहमेत इलाके के किसी भी होटल के गेट तक मात्र बारह युरो में छोडती हैं. मैनें सोचा कि, हमारे यहां वह कहावत सही है कि, "ठगा कर ही सीखा जाता है".

फिर उसनें मुझे भरपेट नाश्ता कराया. उसी दौरान चर्चा मे उसने बताया कि अपने इस पैतृक मकान को उन्होनें
होटल में बदल दिया है. तल मंजील के पिछले हिस्से में उसका परिवार रहता है, मियां बीबी व दो नन्हीं सी बेटीयां.  ड्राईंग रुम को रिसेप्शन का स्वरुप दिया गया व उससे लगे हुए डाइनिंग रुम में ही टेबल कुर्सी लगाकर यात्रियों के नाश्ते - खाने के लिये व्यस्थता कर दी गयी. उसी में एक कम्प्युटर भी रख दिया ताकी यात्री फ्री इन्टरनेट का आनंद ले सकें. होटल व उनके घर का किचन कामन था. ऊपर की दो मंजीलों पर करीब दस कमरे थे जिन्हे किराये पर देने की व्यवस्था कर दी थी. प्रती व्यक्ती किराया बीस युरो के मान से. चुंकी मै सिंगल बेड वाले कमरे में ठहरा था अतः उसके पच्चीस युरो. डबल बेड वाले रुम के चालीस युरो. दोनों मिया बीबी ही होटल का सारा काम काज सम्हाल लेते थे, सिर्फ दिन के समय एक हेल्पर रहता था.    

कुल मिलाकर माहौल बेहद दोस्ताना लगा. नाश्ता करने के बाद ओक्टाय नें पुछा कि अब क्या करना चाहोगे. तो मैनें कहा कि सबसे पहले तो मैं सुल्तान एहमेत इलाके को घुमना चाहता हुं. इस पर उसने मुझे कहा कि चलो मैं आपके साथ चलता हुं. अधिकांश ऐतिहासिक स्थल यहां से नजदीक ही है. मैनें उसे मना भी किया कि आप क्यों
तकलीफ करते हो, क्योंकि मैं उसके साथ जाने में अपने आपको बंधा हुआ महसुस करता. क्योंकि हो सकता है कि मुझे कोई स्थान पसंद आ जाये व वहां ज्यादा रुकने की इच्छा हो जाये पर झिझक के कारण मैं कुछ उसे बोल नहीं पाऊं. किन्तु ओक्टाय नें जोर देते हुए कहा कि मैं भी यहां पर बोर हो रहा हुं. होटल में ठहरे सभी यात्री घुमने के लिये गये हुए हैं, जो शाम से पहले नहीं लौटेंगे. अतः फिलहाल मेरे पास कोई काम नहीं है.  फिर मेरी बीबी तो यहीं है जो मेरी अनुपस्थिती में काम सम्हाल लेगी. 

पहले तो मुझे उस पर तरस आया कि मात्र पच्चीस युरो में पहले रुम, फिर नाश्ता कराने के बाद अब गाईड का
भी काम करेगा. पर ओक्टाय ने कहा जब कि आज मैं आपको इस इलाके के सारे महशुर पर्यटक स्थलों को बाहर से दिखला दुंगा, जिसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा. फिर आप बाद में अकेले आकर तसल्ली से उन्हें देख लेना यह प्रस्ताव मुझे उचीत लगा व मैने हां कर दी.

होटल से चन्द कदमों की दुरी पर ही हिप्पोड्राम, ब्लु मस्जिद, सोफिया हेगिया, सुलेमान मस्जीद, टोपकापी पेलेस इत्यादी जैसे महशुर स्थल उसनें मुझे बाहर से दिखला दिये. फिर मुझे वह एक बाजार में ले गया जो पुरी तरह से कवर्ड था. आटोमान साम्राज्य के प्रथम शासक सुल्तान मेहमेद नें इस बाजार को जिसे ग्रांड बाजार कहा जाता है का निर्माण किया जो आज भी दुनिया का सबसे बडा छत वाला बाजार है. जिसमें तुर्की की हस्तकला,
ज्वेलरी, मसाले, खाने पीने व घर की जरुरत का सामान मिलता हैं. वहां बिकने वाला सामान निश्चीत रुप से हमें पसंद आने लायक हैं. युरोपियन पर्यटकों के लिये तो उसकी कीमत उचीत है, मगर हम हिन्दुस्तानियों को ये सामान शायद महंगे ही लगेंगे.   

फिर मैनें ओक्टाय के कहने पर तुर्की की केसर खरीदी, जो हमारे काश्मीर या स्पेन की केसर के मुकाबले में बहुत सस्ती थी, पर क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं थी. यहां के सुखे मेवे भी बहुत पसंद आये, थोडे बहुत ले लिये. मैनें ज्यादा कुछ् नहीं खरीदा, क्योंकि मेरे पास पहले से वजन ज्यादा था, अतः एयरलाईन्स वालों को मुझे अतिरिक्त लगेज का शुल्क देना पड सकता था. 

फिर ओक्टाय मुझे अपने एक दोस्त की दुकान में ले गया जहां उसनें मुझे पारम्परिक तुर्की चाय पिलाई. इस दुकान में हस्तकरघा का कई तरह का सामान था. हाथ के बुने हुए कालीनों पर बेहतरीन कारीगरी थी, पर बहुत महंगे. हालांकि उन के पास छोटे छोटे कालीन के नमुने भी थे जिसे पेंटींग के समान दीवालों पर सजाया जाता है,
किन्तु मेरा तो मन कुछ भी खरीदने का नहीं था, क्योंकि उन छोटे से कालीन की कीमत भी पांच सो युरो थी. शायद भाव ताव होता होगा, पर मुझे तो लेना ही नहीं था अतः मैनें कोई रुची नहीं बतलाई व कहा कि मुझे यहां से हिन्दुस्तान तक ले जाने में परेशानी होगी. इस पर दुकानदार नें मुझसे कहा कि हम आपके घर कोरियर से फ्री भेज देंगे. तब मैने कहा कि दोस्त, हमारे यहां काश्मीर व भदौही में भी इसी प्रकार के कालीन बनते हैं. 

फिर उसी दुकान पर मैनें हमारे राजस्थान के पेचवर्क के बेग, चादरे इत्यादी सामान भी देखे, जो जयपुर के बाजारों में आसानी से मिल जाता है. जब मैनें दुकानदार से पुछा कि यह सामान कहां का है, तो उसनें उसे तुर्की का बताया. फिर जब मैनें उसे कहा कि यह तो भारतीय है, तो फिर वह सकपका गया. फिर उसनें अपने बचाव में कहा कि हम तो एक थोक दुकानदार से लेते हैं, अब वह कहां से लाता है, इसका मुझे नहीं पता. 

इसी प्रकार मुझे उन दुकानों में जयपुर या उदयपुर में बिकने वाली मुगल या राजस्थानी मिनियेचर पेंटींग्स की
तरह की तुर्की शैली की पेंटीग्स भी दिखीं. इस प्रकार की चित्रकला शैली मुगलों के साथ ही हिन्दुस्तान में विकसीत हुई.  बाबर जो उजबेकिस्तान के समरकंद से हिन्दुस्तान तक आया था. अपने साथ चित्रकार, लेखक, कवि, व भवन निर्माण शिल्पी भी लाया था. इसी कारण मुगल चित्रकला शैली व तुर्की चित्रकला शैली में बहुत कुछ समानता है.  आखिरकार मुगल व तुर्क दोनों नस्लें, हैं तो मन्गोलों की ही वंशज. फिर बाद में इस मुगल चित्रशैली का राजपुत राजाओं ने भारतीयकरण कर उसे राजपुत चित्रशैली के नाम से विकसीत किया. 

यहां के बाजार भी भारतीय या चीनी सामानों से भरे पडे हैं. सैलानी उसे तुर्की मानकर अपने घर ले जाकर खुश होते हैं. हालांकी यहां की पारम्परीक कलाकॄतिया भी बिकती हैं. किन्तु लेबर के दाम अधिक होने से थोडी महंगी लगती है.  हालांकी उस दुकान में मुझे आभास हुआ कि अगर मैं उस दुकान से कुछ सामान लेता तो ओक्टाय को कुछ कमीशन जरुर मिलता.  

इस्तन्बुल के निर्माण को लेकर के एक ग्रीक पौराणीक कथा है. देवताओं का राजा जियस एक सुंदरी लो के प्यार में पड गया. लो के पिता आर्गोस शहर के राजा थे, जो वहां की नदी के देवता भी थे. उन्होनें अपनी बेटी को अपनी पत्नी हेरा जो देवताओं की रानी भी थी, के गुस्से से बचाने के लिये उसे एक गाय में बदल दिया व कहीं दुर भेज
दिया. जब गाय रुप में लो एक नहर के पास से गुजर रही थी, तो उन्होनें उस नहर को बास-फोरस नाम दिया. यहां बास का मतलब गाय से है, व फोरस का मतलब है, किसी नदी में वह उथली जगह जिसे आसानी से पार किया जा सकता हों.  

फिर इसके बाद लो अपने गाय के रुप को छोडकर लडकी के रुप में आ गयी. उसके बाद उसनें एक खुबसुरत सी बेटी केरोसा को जन्म दिया. जिसनें बडे होने पर समुद्र के देवता पोसेईडोन से शादी कर एक बेटे "बायज" को जन्म दिया. जिसनें अपने नाम पर बायजेंटाइम साम्राज्य की स्थापना की. इसके साथ ही बास्फोरस पर स्थीत गोल्डन हार्न नामक प्राकृत्रीक बंदरगाह का नाम अपनी मां का नाम पर रखा. इसलिये गोल्डन हार्न को स्थानीय भाषा में केरोस भी कहा जाता है.    

इस्तन्बुल के बारे में कहा जाता है कि आज से करीब पांच हजार साल पहले इस इलाके में लोगों नें बसना शुरु कर दिया था. किन्तु ईसा पुर्व 660 BC सातवीं शताब्दी में ग्रीक लोगों ने एक नगर बसाया, जिसका नाम राजा बायज नें अपने नाम पर बायजेंटाइम रखकर इस महान साम्राज्य की स्थापना की.  

फिर इसके बाद लगभग हजार साल बाद 330 AD - 395 AD में इस पर रोमन लोगों का कब्जा हो गया.  इसी दौरान महान रोमन सम्राट कोन्स्टान्टाईन नें इस शहर का पुनर्निर्माण कर इसे भव्य स्वरुप प्रदान किया. व इस
शहर को सम्पुर्ण रोमन साम्राज्य की राजधानी घोषित करते हुए नया नाम दिया, "कोन्सटान्टीनोपल". हालांकी इसी दौरान इसका एक और नया रोम (न्यु रोम) भी करने की कोशिश की गयी, किन्तु वह जनता को पसंद नहीं आया, अतः इसका नाम कोन्सटान्टीनोपल ही रहा.

फिर कुछ ही वर्षों बाद इस नगर पर दोबारा से बायजेंटाईन शासकों नें विजय हासिल कर ली व सन 395 AD से 1453 AD तक शासन किया. सन 532 में हेगिया सोफिया नामक एक भव्य व बहुत बडा ग्रीक आर्थोडाक्स चर्च बनाया गया, जो आज भी इस्तन्बुल शहर की पहचान है. इस प्रसीद्ध इमारत को कई इतिहासकार मध्ययुग के सात महान आश्चर्यों में गिनते हैं. तब क्रिश्चियन धर्म यहां का राजधर्म था. इसी दौरान यहां व्यापार, संस्कृती, राजनिती, भवन निर्माण के क्षेत्र में बहुत तरक्की हुई. और यह नगर युरोप, अफ्रिका व एशिया का एक महत्वपुर्ण शहर बन गया, तब इसे कुस्तुन्तुनिया भी कहा जाता था.  उसी दौरान मात्र कुछ समय के लिये सन 1204 से 1261 के दौरान लेटीन साम्राज्य का शासन रहा. लेकीन बाद में फिर से बायजेंटाईन लोगों का कब्जा हो गया जो 1453 तक लगातार जारी रहा. 

फिर आटोमान (ओस्मान या उस्मान) तुर्क योद्धाओं नें इस शहर के आसपास की सारी जगह को जीतना शुरु कर
दिया. अंत में साहसी योद्धा सुल्तान मेहमेद के नैतृत्व में 53 दिन तक शहर का घेराव किया व अंतीम बायजेंटाईन शासक "कोन्स्टान्टाईन छ्ठे" को मारकर 29 मई 1453 से आटोमान शासन की नींव डाली. उसनें इस खुबसुरत शहर का नाम बदलकर इस्तन्बुल कर दिया.  फिर आटोमान वंश का सन 1922 तक तुर्की पर शासन रहा. 

प्रथम आटोमान शासक सुल्तान मेहमेद नें पुरे इस्तन्बुल का पुनर्निर्माण कर इसे एक भव्य स्वरुप प्रदान किया.  उसनें कई भव्य महल, मस्जिद, स्कुल, अस्पताल, हमाम का भी निर्माण किया. उसके बनाये हुए अधिकांश भवन आज भी सही सलामत खडे हैं, जो आज भी इस्तन्बुल की शान बढा रहे हैं.  

उसके महशुर वंशज सुलेमान नें सन 1520 से 1566 तक शासन किया. जिसके नैतृत्व में इस्तन्बुल शहर नें हर
विधा में प्रगती की. तब इसकी आबादी बढकर दस लाख हो गयी थी. आटोमान साम्राज्य के दौरान तुर्की का मुख्य धर्म इस्लाम हो गया था. उसी दौरान साहसी तुर्क लोगों का प्रभुत्व मिस्र, ग्रीस, बुल्गारिया, रोमानिया, मेसेडोनिया, हंगरी,  अल्जीरिया, इसरायल, जार्डन, लेबनान, सीरिया के अलावा उत्तरी अफ्रिका के कई हिस्सों सहित अरब देशों पर भी हो गया था. 

किन्तु सुल्तान मेहमेद द्वारा बसाया गया यह महान आटोमान साम्राज्य लगभग पांच सो बर्षों के बाद, प्रथम विश्वयुद्ध के साथ ही ढ्ह गया. सन 1923 में रिपब्लीक आफ टर्की का जन्म हुआ. उसके बाद तुर्की की राजधानी एशिया महाद्वीप में अंकारा ले जाई गयी. उसके बाद भी इस्तन्बुल का बहुत तेजी से फैलाव हुआ. अब यह दुनिया के सबसे बडे महानगरों में शुमार हो गया. आज इस्तन्बुल की आबादी एक करोड चालिस लाख हो चुकी है. 

आज इस्तन्बुल दुनिया का पांचवां सबसे ज्यादा प्रसिद्ध टुरिस्ट प्लेस है. इसे युरोपियन सिटी आफ कल्चर नाम दिये जाने के बाद, पिछले वर्ष सन 2012 में यहां 1.16 करोड विदेशी यात्री आये. जबकी उस वर्ष पुरे हिन्दुस्तान में मात्र साठ लाख विदेशी यात्री ही आये थे. कारण इस्तन्बुल में आज वह सब कुछ है जो एक पर्यटक खोजता है.
यहां की जनता, पुलिस, प्रशासन, दुकानदार सभी पर्यटकों का पुरा ध्यान रखते हैं. वहीं उसके विपरीत हमारे देश में अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों की मुठभेडें टेक्सी वालों, भिखारियों, गाईड, ठगों, होटल वालों, पुलिस वालों, दुकानदारों इत्यादी से होती है, जिन्हें हर कोई नोचता-खसोटता है.  

मुझे एक परिचीत बुजुर्ग ने अपनी जवानी का एक अनुभव बताया था. वह घटना आज से करीब चालीस वर्ष पुर्व की रही होगी. तब वे एक म्युनीख में एक जर्मन भाषा के समाचार पत्र में काम करते थे. एक बार एक  ट्रक निर्माता कम्पनी "मान" का विज्ञापन उनके समाचार पत्र में छपा, कि उन्हें अपने ट्रकों को जर्मनी से काठमांडु भेजने के लिये ड्रायवरों की आवश्यक्ता थी. यह पढकर वे बडे उत्साहित हो गये क्योंकि इस प्रकार उन्हें मुफ्त में कई देशों में घुमने का मौका मिल रहा था. 

एड्वेंचर के लिये वे अपने एक दोस्त के साथ जर्मनी से ट्रक लेकर युरोप के कई देशों का सफर करते हुए इस्तन्बुल के रास्ते बास्फोरस स्ट्रेट पार करते हुए एशिया में दाखिल हुए.  फिर ईरान, पाकिस्तान व हिन्दुस्तान से होते हुए वे काठमाण्डु तक पहुंचे थे. उनका वह किस्सा बहुत रोचक था. उन्हें मार्ग में किसी भी प्रकार की कोई समस्या नहीं हुई, बल्कि हर देश में जनता व पुलिस नें उन्हें सहयोग दिया था. 

हिन्दुस्तान के अमृतसर से लगी बाघा बार्डर से तुर्की की दुरी मात्र 4100 किलोमीटर ही है. यह रास्ता लाहौर (पाकिस्तान), तेहरान (ईरान) पार करते तुर्की के सीमा शहर "बाजारगान" तक बना हुआ है. इसी प्रकार हिन्दुस्तान में लेह (लद्दाख) से कन्याकुमारी (तमिलनाडु) तक की दुरी भी लगभग 4100 किलोमीटर ही होती है. शायद यह सुनकर कई उत्साही पर्यटकों के हाथ अपनी कार की चाभी की ओर बढ गये होंगे. अगर परिस्थितीयां अनुकुल हों तो सडक मार्ग से तुर्की तक जाया जा सकता हैं.  लेकिन एशिया का सडक मार्ग अब आतंकवाद व युद्ध के कारण सुरक्षीत नहीं रहा है, इसलिये फिलहाल इस प्रकार की यात्रा के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है. 

किन्तु इसके विपरीत युरोप के अधिकांश देशों में आज भी तुर्की से सडक या रेल मार्ग से जाया जा सकता है.  किसी जमाने में इस्तन्बुल से पेरिस तक ओरियंट एक्सप्रेस ट्रेन चलती थी. इस ट्रेन ने 1883 में महान संगीतकार मोजार्ट की धुनों के साथ पेरिस स्टेशन से अपनी पहली यात्रा शुरु की थी, जो फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रीया, हंगरी, रोमानिया, बुल्गारिया होती हुई तुर्की में इस्तन्बुल तक पहुंचती थी. यह उस समय विश्व की प्रसीद्ध ट्रेनों में शुमार थी. तब इस 3100 किलोमीटर की पेरिस से इस्तन्बुल की यात्रा में लगभग 80 घंटे लगते थे.  यह ट्रेन 1977 में इस्तन्बुल आना बंद हुई.  मैनें कहीं पढा था कि, वर्षों पुर्व इसी ओरियंट एक्सप्रेस से श्री विवेकानंद जी नें भी अपने विश्वभ्रमण के दौरान युरोप की यात्रा की थी.  

इस्तन्बुल का सुल्तान एहमेत इलाका एक ओपन एयर म्युजियम की तरह लगता है. कहीं भी नजर दौडाओ,
कुछ ना कुछ ऐतिहासिक भवन दिखता है. इनकी बनावट भी लगभग हमारे मुगलों द्वारा बनाये गये भवनों की तरह ही थी. हो सकता है, आटोमान शासकों व मुगलों में कोई ना कोई सम्बन्ध रहा होगा, क्योंकि दोनो ही तो सेन्ट्रल एशिया से आये थे, व दोनों मंगोलों के वंशज थे. यहां प्रवेश करते ही सबसे पहले दिखता है हिप्पोड्रोम. यह एक विशाल खेल का मैदान है जो सम्राट कोन्स्टान्टीनोपल द्वारा सन 324 में बनाया गया था. यह जगह सदीयों से खेल के अलावा सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतीक गतिविधियों की केन्द्र रही है. हिप्पोड्रोम का ग्रीक भाषा में मतलब होता है, घुडदौड का मैदान. यह लगभग 450 मीटर लम्बा व 130 मीटर चौडा है, व किसी समय इसमें लगभग एक लाख दर्शकों के देखने की व्यवस्था थी. 

इस मैदान में कई महत्वपुर्ण ऐतिहासिक स्मारक भी बने हुए हैं. जिसमें महत्वपुर्ण है, "मिस्री फराओ - टुथमोस III का ओबेलिस्क". इसे सम्राट थिओडिसियस सन 390 AD में इजिप्ट से लाये थे. लगभग 25 मीटर उंचा यह
विशाल खम्बा लगभग 3500 वर्ष पुराना है. इसे आज से लगभग सोलह सो साल पहले इजिप्ट से यहां तक लाना भी बहुत मुश्किल काम था, किन्तु इसे नील नदी के रास्ते अलेक्जेन्ड्रीया तक मेडीटेरीयन सागर तक लाया गया. फिर वहां से समुद्री मार्ग से इस्तन्बुल तक लाया गया. 

इसी ओबेलिस्क के पास खडा है एक सर्पाकार "सर्पेंट कालम" जिसे ग्रीक सेनाओं की इरानियों पर पांचवी शताब्दी में विजय के प्रतीक चिन्ह के रुप में बनाया था. इसी मैदान में एक और विशाल खम्बा जिसे "वाल्ड ओबेलिस्क" कहते हैं खडा है. इसे 10 वीं शताब्दी में सम्राट कोन्स्टान्टीन द्वारा बनाया गया था.  यहां एक जर्मन फव्वारा भी है, जिसे जर्मन सम्राट कैजार विल्हेम नें अपनी इस्तन्बुल यात्रा को यादगार बनाने के लिये सन 1900 में बनाया था. 

हेगिया सोफिया या आया सोफिया इस्तन्बुल का सबसे प्रसिद्ध ऐतिहासिक इमारत है. इस क्रिश्चियन चर्च को रोमन सम्राट जस्टिनियन नें सन 537 AD में बनाया था. फिर प्रथम आटोमान शासक सुल्तान मेहेमेद नें 1453 में इसके चारों ओर मिनारें खडी कर इसे एक मस्जीद में बदल दिया. लेकिन सबसे अच्छी बात यह रही कि उसनें व उसके वंशजों नें अंदर की भव्य मोजेक पेंटींग्स, कलाकृतियों, क्रिश्चियन प्रतीक चिन्हों व संतों कॉ समाधीयों को नहीं तोडा, जो आज भी सही सलामत हैं. उसनें सिर्फ मुस्लिम प्रतिक चिन्ह उसमें बढा दिये, व अरबी भाषा में कुरान की आयतें लिख दी गयीं.  हमें बाहर से इस भवन के चर्च नहीं मस्जिद होने का आभास होता है, किन्तु अंदर जाने के बाद यह एक चर्च ही लगता है. आज यह भवन अपने निर्माण के 1500 वर्ष निकल जाने के बाद भी मजबुती से खडा है. इसका प्रवेश शुल्क 10 युरो है. 

फिर तुर्की गणराज्य बनने के बाद सन 1935 में प्रथम राष्ट्रपति मोहम्मद अतातुर्क नें हेगिया सोफिया को एक राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर एक म्युजियम में बदलकर पिछली पन्द्रह सदियों से चल रहे एक विवाद को खत्म ही कर दिया. इस प्रकार उन्होनें तुर्की को एक उदारवादी मुस्लिम राष्ट्र में बदलने की नींव रखी.  उनके लिये यह समस्या बिलकुल उसी तरह की थी, जैसा कि हमारा अयोध्या का बाबरी मस्जीद विवाद.  इसी कारण आज आधुनिक तुर्की का नाम लिया जाये व मुस्तफा कमाल अतातुर्क का नाम ना लें यह सम्भव नहीं. उन्होनें तुर्की को एक नया स्वरुप दिया उसे मध्ययुगीन मानसिकता से निकालकर एक आधुनिक सोच वाले राष्ट्र में तब्दिल कर दिया. उनका वहां वही सन्मान है जो हमारे यहां महात्मा गांधी का है. उनके नाम पर बनाया गया अंतर्राष्ट्रीय विमान तल का नाम रखा गया है जो दुनिया का एक बडा व आधुनिक एयरपोर्ट है.  

लगभग सात लाख वर्ग मीटर में फैला इस्तन्बुल का तोपकापी सराय पेलेस दुनिया के सबसे भव्य व रंगीन राजमहलों में से एक है जो, आटोमान वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है. सुल्तान मेहेमेद नें अपनी विजय के बाद इसे बनाना शुरु कर दिया था, उसके बाद से लगभग 400 बर्षों तक (1465 to 1856) उसके वंशजों नें यहीं रहकर अपने विशाल तुर्की साम्राज्य पर शासन किया.  गोल्डन हार्न के एक महत्वपुर्ण स्थान व छोटी सी पहाडी पर बने इस शाही आवास से मारमरा समुद्र व बासफोरस का बहुत शानदार नजारा दिखता है. इस पेलेस के मुख्य दरवाजे पर तोप रखी होने के कारण इसका नाम तोपकापी सराय पडा. इसमें चार विशाल प्रांगण हैं, जिसमें शाही आवास, हरम, बाग बगीचे, फव्वारे, दरबार भवन, हमाम, भोजनशाला, शाही खजाना, आयुधशाला, शाही मस्जीद, लायब्रेरी, के अलावा कई अन्य महत्वपुर्ण भवन हैं.  कभी इसमें सुल्तान के अलावा चार हजार कर्मचारीयों के रहने की व्यवस्था हुआ करती थी. 

इसी पेलेस में बने तोपकापी पेलेस म्युजियम में आटोमान शासकों से संबन्धित अनेकों सामग्रियां जैसे हथियार, कपडे, बर्तन, फर्निचर, पेंटींग्स, आभुषण, वाहन, पार्सेलीन क्राकरी, सिक्के प्रदर्शित किये गये हैं. जिनसे उनकी सम्पन्नता का पता चलता है.  पेलेस में प्रवेश का कोई शुल्क नहीं है.  किन्तु म्युजियम का प्रवेश शुल्क 8 युरो व शाही हरम का प्रवेश शुल्क 6 युरो है. 

इसके बाद सन 1853 में सुल्तान अब्दुल नें गोल्डन हार्न पर समुद्र के किनारे एक बेहद खुबसुरत फ्रेन्च स्टाईल में बने डोल्माबाचे पेलेस का निर्माण कराया जो बाद के सभी आटोमान शासकों का शाही आवास बना. इसमे 285 कमरे,  43 बडे हाल, व 5 तुर्की हमाम हैं.  तुर्की गणराज्य घोषीत होने के बाद प्रथम राष्ट्रपती अतातुर्क रहते तो राजधानी अंकारा में ही थे, किन्तु जब वे इस्तन्बुल आते तो इसी पेलेस में ठहरते थे, व उनकी मृत्यु भी अपनी बीमारी के दौरान इसी पेलेस में हुई थी. 

ब्लु मास्क या नीली मस्जीद को आया सोफिया चर्च की टक्कर में सुल्तान मेहेमेद द्वितीय नें बनाया. इसमें लगे नीले फर्श के कारण इसका नाम ब्लु मास्क पडा. यह आज भी इस्तन्बुल की सभी मस्जिदों में भव्य है. इसमें छह मिनारें हैं व बहुत बडा दालान है.  इसी प्रकार सन 1558 में सुल्तान सुलेमान द्वारा अपने नाम पर, इस्तन्बुल की तीसरी पहाडी पर एक खुबसुरत "सुलेमान मस्जीद" बनाई जो इस शहर की सबसे बडी मस्जीद है. 

इन सबके अलावा इस्तन्बुल के महत्वपुर्ण दर्श्निय स्थलों में बेसीलिका सिस्टर्न, गलाता टावर, आर्कियोलाजी म्युजियम, कारिये म्युजियम (कोरा चर्च), स्पाइस बाजार या इजिप्शियन बाजार,  इस्तिकाल चड्डेसी (स्ट्रीट), ग्रांड बाजार, फतेह मस्जिद, रुमेली फोर्ट्रेस, तकसीम स्क्वायर इत्यादी हैं.  

मैं ओक्टोय के कहने पर आधे दिन के गाईडेड इस्तन्बुल टुर पर भी गया. इसका मुख्य आकर्षण लगभग एक घंटे का गोल्डन हार्न भ्रमण था.  जेली फिश से भरे इस विशाल नदीनुमा प्राकृत्रीक बंदरगाह को स्टीमर से घुमना निश्चित रुप से एक यादगार अनुभव था. इसके दोनों ओर भव्य इमारते, मस्जीद, महल इत्यादी बने हुए हैं.  उसके बाद बस से इस्तन्बुल शहर को घुमाया गया. इसमें एक गाईड भी साथ में थी, जिसनें अपने चुलबुलेपन से सबको बांधे रखा. इस सीटी टुर की कीमत 12 युरो थी, जिसमें होटल से पिकअप भी शामिल था. 

तुर्की में हमाम का उपयोग पिछले हजार वर्षों से आम जनता सिर्फ नहाने के लिये ही नहीं करती रही है, वरन वे तुर्की जीवन पद्धती के अंग बन चुके थे. ये सामाजिक मेल मिलाप के एक बडे केन्द्र रहे हैं. ठीक उसी प्रकार जैसे हिन्दुस्तान के गावों के पनघट, जो दैनिक उपयोग के पानी के अलावा सामाजिक मेल - मिलाप के केन्द्र भी होते हैं, क्योंकि वहां महिलाएं काम के अलावा गपशप भी कर लेती है. 

ओक्टाय के कहने पर मै भी एक सुबह नजदीक ही एक पुराने व भव्य हमाम में गया तो, पर नहाया नहीं, कारण बहुत महंगा था. वहां प्रवेश निशुल्क था, किन्तु किसी सुविधा का उपयोग करने पर शुल्क देना पडता है. इस्तन्बुल में कई शताब्दियों पुराने हमाम आज भी उपयोग में आ रहे हैं, हालांकी उनका आधुनिकीकरण कर दिया गया है. यहां लगभग 50 युरो देकर नहाया जा सकता है, जिसमें मसाज भी शामिल है. अकसर आने वाले लोकल व्यक्ती इन हमाम की मेम्बरशिप ले लेते हैं, जो सस्ती पडती है. 

टर्कीश हमाम में महिलाओं व पुरुषों के लिये अलग अलग विभाग बने होते हैं.  हमाम में सबसे पहले कमरे में गर्म सुखी हवा से शरीर को सेका जाता है, जिसके कारण शरीर से बहुत पसीना निकलता है. फिर उसके बाद एक गर्म पानी के कमरे में ले जाया जाता है, जहां साबुन व पानी से नहाकर, फिर बाडी मसाज की जाती है. उसके बाद अगले कमरे में ले जाया जाता है, जहां ठंडे  पानी से नहाया जाता है. फिर इस कमरे में बैठकर अपनी शरीर को रिलेक्स किया जाता है, व उसी दौरान आसपास बैठे लोग आपस में गपशप कर लेते है. यहां के मेनेजर नें मुझे बताया कि वर्षों पुर्व टर्किश हमाम सारे युरोप में प्रचलित थे, यहां तक की किसी समय ब्रिटेन में ही पांच सो से ज्यादा टर्कीश हमाम थे.    

यहां कई हिन्दुस्तानी रेस्टोरेंट हैं, जहां हमें अपनी पसंद का खाना मिल सकता है. जैसे सुल्तान एहेमेत इलाके में ही डब रेस्टोरेंट. यहां का खाना लजीज है. पर यहां एक शाकाहारी पंजाबी थाली की कीमत 20 युरो है.  यह रेस्टोरेंट सुल्तान अहमत इलाके में महशुर है. ओक्टोय नें मुझे अन्य भारतीय रेस्टोरेंट के बारे में भी बताया था जैसे स्वाद, ताजमहल, तन्दुरी, मुसाफीर. पर मेरे होटल से सबसे नजदीक यही था, अतः मैनें यहीं भोजन करना उचित समझा.  

तुर्की भोजन स्वादिष्ट होता है. यह सेन्ट्रल एशिया के देशों, खाडी के अरब देशों व बालकन देशों की पाककला का मिलाजुला संगम है. इस तुर्की पाककला को आटोमान साम्राज्य के दौरान शाही खानसामों नें सुल्तानों के स्वाद अनुसार एक नया स्वरुप दे दिया.  वैसे समुद्र के किनारे पर बसा होने से तुर्की में सी-फुड के रुप में मांसाहार का प्रचलन ज्यादा है.  किन्तु डोल्मा, कोफ्ते, इमाम बायिल्डी, पिलाफ (पुलाव), टुर्सु, दही व सलाद तुर्की शाकाहारी डीश हैं. जिनके बनाने में बैंगन, गोभी, धनिया, शिमला मिर्च, टमाटर, खीरा, प्याज, लहसुन, चावल के अलावा कई स्थानीय सब्जीयों का उपयोग किया जाता है.   ब्लेक टी, अयरान (नमकीन लस्सी), शरबत (विभिन्न स्वादों), फ्रुट ज्युस,  सलगम सुयु (शलजम ज्युस), साहलेप, बोझा (अल्कोहल युक्त) तुर्की पेय हैं, जो आसानी से उपलब्ध हैं. 

तुर्की लोग सुबह का नाश्ता सादा पसंद करते हैं, जिसे मेनेमेन कहा जाता है. इसमें पनीर, ककडी, टमाटर, अंडे, मक्खन, शहद, जेम, आलिव आईल व जलेबीनुमा गोल ब्रेड सिमिट का उपयोग किया जाता है. इसे नाश्ते को कहवाल्ती भी कहा जाता है. जिसका मतलब होता है, सुबह कहवा (काफी) पीने के पहले का खाना.  आम तुर्की लोग घर का बना खाना ही पसंद करते हैं, जिसमें सुप, सब्जीयों, मसालों, चावल, मांस, मछली, दही का उपयोग होता है. लेकिन आधुनिक जीवन शेली के कारण आजकल पती पत्नी दोनों ही काम करते हैं, तो फिर बडे शहरों में युरोपियन स्टाइल का डिब्बा बंद भोजन या रेस्टोरेंट में खाने का प्रचलन बढता जा रहा है. इसी कारण फास्ट फुड भी आसानी से उपलब्ध है.  

तुर्की के युरोपियन युनियन में शामिल होने की चाह नें सन 2005  स्थानीय सरकार नें करंसी का परिवर्तन कर टर्कीश लीरा को उपयोग में लाना शुरु कर दिया है कारण वह अपनी लीरा को युरो के समकक्ष में लाना चाहते है. किन्तु इस परिवर्तन के कारण महंगाई बहुत बढ गयी थी. यहां आने वाले अंतर्राष्ट्रीय सैलानियों की सुविधा के लिये युरो प्रचलन में है. बाजारों में बिकने वाला सामान, टेक्सी, होटल, किताबें, यहां तक की सब्जी - फ्रुट वाले भी युरो में ही कीमत बताते हैं. एक तुर्कीश लीरा लगभग 30 रुपये के बराबर है. तुर्की नें सन 2006 से युरोपियन युनियन में शामिल होने की अर्जी दे रखी है, किन्तु अभी तक इस पर निर्णय नहीं हो पा रहा है. कारण स्पष्ट है, तुर्की का एक छोटा सा हिस्सा ही युरोप में शामिल है.  दुसरे यहां की अधिकांश आबादी मुस्लिम है, जिसमें कभी आतंकवाद के हावी होने का खतरा युरोपियन युनियन के क्रिश्चियन देशों को सता रहा है. 

मैनें इस्तन्बुल शहर को देखने के लिये "हाप आन - हाप आफ" बस का एक दिन का पास लिया 20 युरो में लिया. दुनिया के अधिकांश शहरों में पर्यटकों की सुविधा के लिये दोमंजिला बसें चलती हैं, जिनकी छत खुली होती है. ये बसे एक निर्धारीत मार्ग पर जिसमें उस शहर के अधिकांश दर्श्नीय स्थल होते हैं पर चलती है. आप अपने मन पसंद स्टाप पर उतर कर, तसल्ली से उस भवन या स्मारक को देख सकते हैं.  फिर अगले स्थान तक जाने के लिये आपको एक तय समय जैसे हर 15 मिनट या 30  मिनट के बाद अगली बस मिल जायेगी. 

इन बसों में आपको कई भाषाओं में चलने वाली चलीत कामेंट्री सुनने के लिये हेडफोन भी दिये जाते है, जिससे आपको उस मार्ग में आने वाली सभी महत्वपुर्ण भवनों, सडकों, चौहारों इत्यादी के बारे में पुरी जानकारी मिल जाती है. आजकल इस प्रकार की बसे हिन्दुस्तान के दिल्ली, जयपुर जैसे शहरों में भी शुरु हो गयी हैं.  मैं किसी भी नये शहर को देखने के लिये इन्हीं बसों से यात्रा करना पसंद करता हुं, ताकी अपनी पसंद के स्थलों पर तसल्ली से रुका जा सके. अन्यथा किसी गाईडेड टुर में आपको किसी दर्शनीय स्थल पर उतारने के पहले ही गाईड डरा देता है कि, ठीक पन्द्रह मिनट बाद आप लौट आना अन्यथा यह बस आपको छोडकर चली जायेगी. इतनी हडबडी में उस स्थान को देखने का मजा नहीं आता है.

हालांकी गाईड के साथ में होने के कुछ फायदे भी होते हैं.  पर मुझे तो हाप आन हाप आफ बस ही पसंद है, पर इन बसों में घुमने के लिये आपको उस शहर के पर्यटक स्थलों के बारे में पहले से जानकारी हासिल करना होगी. वैसे तो टिकट के साथ उस बस के रुट सहित नक्षे वाला ब्रोशर भी साथ में मिलता ही है, जिसमें आपको उस मार्ग में आने वाले सभी महत्वपुर्ण स्थानों के बारे में जानकारी मिल जाती है. 

तुर्की की हवा में खुलापन है, यहां अन्य मुस्लिम देशों जैसे माहोल नहीं है. विशेषकर इस्तन्बुल की नारियां आधुनिक वेशभुषा पहनती हैं. हालांकी अब छोटे शहरों व गावों में कट्टरवाद धीरे धीरे अपने पैर पसारने लगा है जिसके कारण महिलाओं नें सिर पर स्कार्फ का उपयोग शुरु कर दिया हैं.   

एक शाम शहर में घुमते हुए एक किताब की दुकान में गया, वहां मैने पाया कि अधिकांश किताबें तुर्की भाषा में थी, जो मेरी समझ से बाहर थी. मैं बिना कुछ खरीदे लौट ही रहा था कि सेल्समेन नें आकर मुझे तुर्की के प्रथम नोबल पुरस्कार विजेता "ओरहन पामुक" की अंग्रेजी में छपी किताब "इस्तन्बुल - मेमोरिज आफ ए सीटी" बताई, जिसे मैनें खरीद लिया. श्री पामुक को 2006 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला था.  उसी सेल्समेन नें मुझे हिन्दुस्तानी जानकर बताया कि आजकल श्री पामुक अपने तलाक के बाद आजकल बुकर पुरस्कार विजेता साहित्यकार किरण देसाई के साथ रह रहे है, जो शायद आपस में विवाह करने वाले हैं.

इस्तन्बुल गर्मियों में हर तरफ रंग बिरंगा बेहद खुबसुरत लगता है. सर्दियों में इसके विपरीत उससे ज्यादा खुबसुरत लगता है, बशर्ते बर्फबारी हुई हो. मैं खुशकिस्मत हुं कि मुझे युरोप से लौटते समय एक बार फिर इस्तन्बुल को जनवरी के प्रथम सप्ताह में भी देखने का मौका मिला था. वह दृष्य आज भी मेरी आखों के सामने है, हर तरफ सफेदी की चादर छाई हुई थी. मकान, सडकें, पेड - पौधे, कारें, महल, मस्जीद, ट्राम, रेल की पटरियां इत्यादी सब कुछ सफेद दिख रहीं थीं. ऐसा लग रहा था कि पृक्रती ने यहां के सारे रंग चुरा लिये हों, और बदले में सिर्फ सफेद रंग ही दिया हो. यहां के बाशिंदे बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव यहां भी पडा है, उसके नतीजे में, पिछले कुछ वर्षों से बर्फ कम ही गिरती है. अगर गिरती भी है तो मात्र कुछ दिनों के लिये ही.  

दिल्ली व मुम्बई से प्रतिदिन टर्किश एयरवेज की फ्लाईट इस्तन्बुल के लिये जाती है. अतः युरोप या अफ्रिका जाने वाले यात्री यहां 2 - 3 दिन का स्टाप लेकर, इस्तन्बुल घुम-फिर कर आगे की यात्रा पर जा सकते है. इस प्रकार इस्तन्बुल भ्रमण सस्ते में हो सकता है. हालांकी इस्तन्बुल एयरपोर्ट पर हिन्दुस्तानियों को थोडी मेहनत के बाद ट्रान्जिट वीजा मिल तो सकता है, बशर्ते उनके पास अपने गंतव्य स्थल का वीजा हो. पर किसी प्रकार की असुविधा से बचने के लिये यात्रा शुरु करने के पुर्व हिन्दुस्तान में तुर्की दुतावास से वीजा लेना ही बेहतर होगा.  

अगर मुझे फिर कभी इस बेहद खुबसुरत शहर इस्तन्बुल आने का मौका मिलेगा, तो मैं अवश्य आना चाहुंगा. वैसे भी तुर्की के एशिया वाले भाग में बहुत कुछ देखने लायक है, जैसे अंकारा, कप्पाडोचिया, ट्रोय, पामुक्काले, बोडरुम केसल, माउंट नेमरुत, सेल्सस की लायब्रेरी, गोरेमे फेयरी चिमनी,  आसपेन्डस थियेटर इत्यादी हैं.    

विनोद जैन
ई-मेल - vinodthetraveller@gmail.com

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दैनिक भास्कर की पत्रिका "अहा ! जिंदगी" के 11 वें वार्षिकांक में प्रकाशित मेरा लेख - "इस्तांबुल - सौन्दर्य अनेक रुपों में बिछा है यहां"










Vinod Jain

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